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पिप्सिंग

इस ट्रेडिंग दृष्टिकोण का उपयोग इंट्राडे करेंसी में उतार-चढ़ाव से लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता है। कुछ ट्रेडर्स एक दिन में 200 से अधिक डील्स ओपन करते हैं जबकि पोजीशन कुछ मिनटों के लिए हीं खुली रखते हैं। बेशक, प्रत्येक पोजीशन से लाभ छोटा होता है, लेकिन कुल मिलाकर यह एक महत्वपूर्ण राशि में जमा हो सकता है।
 
पिप्सिंग की अवधारणा इंट्राडे मूवमेंट से कमाई करना है। यदि हम डेली ओपनिंग प्राइस और क्लोजिंग प्राइस लेते हैं, तो औसतन, मुद्राएं दिन के दौरान लगभग 50-60 पॉइंट्स तक मूव करती हैं। हालांकि, करेंसी रेट्स हमेशा दिन में ऊपर या नीचे नहीं जाती हैं, बल्कि मामूली उतार-चढ़ाव करती हैं जिससे पिप्स की कुल राशि काफी बड़ी हो जाती है। पिपसर्स इन विशेष उतार-चढ़ाव को पकड़ने की कोशिश करते हैं।
 
यह दृष्टिकोण रूलेट के समान है - समान खेलने के तरीके, लगभग समान बाधाएं, हालांकि इस दृष्टिकोण का उपयोग करने पर फॉरेक्स में हानि की संभावना दोगुनी हो जाती है।
 
प्रणाली की विफलता निश्चित है। उसके कई कारण हैं।
 
1. छोटी से छोटी रेट के उतार-चढ़ाव को भी न चूकने की कोशिश करते हुए, पिप्सर्स स्टॉप लॉस को करेंट मार्केट प्राइस के बहुत करीब सेट करते हैं।
 
यदि बुल और बीयर की ताकत का गलत अनुमान लगाया गया हो तो प्राइस रेट के करीब स्टॉप लॉस मार्केट के शोर से नुकसान की संभावना को बढ़ाता है, भले ही ट्रेंड डाइरेक्शन का निर्धारण सही ढंग से किया गया हो। पूरे दिन के लिए डाइरेक्शन निर्धारित करने की तुलना में अगले घंटे के लिए प्राइस डाइरेक्शन निर्धारित करते समय गलती करना आसान है।
 
नुकसान के जोखिम के साथ स्टॉप लॉस ऑर्डर के निष्पादन से बचने का सबसे आसान तरीका ऐसा ऑर्डर बिल्कुल नहीं करना है। लेकिन इस मामले में यदि एक स्ट्रॉंग प्राइस मूवमेंट आपके खिलाफ है तो आप और भी अधिक पैसा खोने का जोखिम उठाते हैं । यह तब होता है जब प्राइस इतनी आगे बढ़ जाती है कि अगले कुछ मिनटों या घंटों में पिछले लेवल्स पर लौटने की संभावना नहीं होती है। जब बिना कोई स्टॉप लॉस लेवल रखे डिपॉजिट के एक बड़े हिस्से को मार्जिन के रूप में रखते हैं, तो मार्जिन कॉल प्राप्त करने की रिस्क अधिक हो जाती है, यानी पूरी डिपॉजिट खोना।
 
2. वास्तविक धन की ट्रेडिंग तनाव को बढ़ावा देती है। एक नियम के रूप में, इस रणनीति को पहले डेमो अकाउंटस पर परीक्षण किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई वास्तविक धन शामिल नहीं होता है। इसलिए, इसे खोने का कोई डर नहीं होता है, और ऑर्डर्स स्वचालित रूप से निष्पादित होते हैं, यानी तुरंत।
 
इसलिए, कई फ़ैक्टर्स हैं, जिनमें ऑर्डर निष्पादन की गति और तनाव शामिल है, जो कीमत के गलत दिशा में बढ़ने पर प्रत्येक पिप के साथ बिगड़ते जाते हैं। पिप्सिंग रणनीति का तात्पर्य मार्केट में निरंतर उपस्थिति से है, जो निश्चित रूप से तनाव लाता है। इससे चेतनाशून्य फैसले हो सकते हैं।
 
हमें इस तथ्य का भी उल्लेख करना चाहिए कि ब्रोकर्स उन ग्राहकों को पसंद नहीं करते जो बड़ी संख्या में लेनदेन का अनुरोध करते हैं। प्रति निश्चित अवधि के लिए अनुरोधों की मात्रा पर कुछ प्रतिबंध है। इसलिए, अग्रेसीव ट्रेडर्स जो हर सेकेंड ऑर्डर का अनुरोध करते हैं, उन्हें अकाउंट क्लोज करने के लिए कहा जा सकता है।
 
स्कैल्पिंग के मामले में सकारात्मक परिणाम की संभावना अधिक होती है। यह पिप्सिंग के समान है, लेकिन इसका लक्ष्य प्रति ट्रेड कई पिप्स से अधिक है।
 
स्कैल्पिंग रणनीति के कई दृष्टिकोण यहां दिए गए हैं:
 
- कई करेंसी पेयर्स पर एक साथ ट्रेडिंग और एक ग्रुप के रूप में उनके मूवमेंट को इंवेस्टिगेट करने का प्रयास। इनमें से 90% प्रणालियां अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करेंसी के ग्रुप मूवमेंट पर आधारित हैं। हालांकि, यूरो और पाउंड पर आधारित प्रणालियां हैं;
 
- ट्रेडर्स एक ड्राइविंग करेंसी पेयर और एक लिंगरिंग करेंसी पेयर चुनते हैं। मान लीजिए, EUR/USD को सिग्नल पेयर के रूप में चुना जाता है और AUD/USD को ट्रेडिंग के लिए करेंसी पेयर के रूप में चुना जाता है (इसे यूरो की तुलना में देरी से आगे बढ़ना चाहिए);
 
- ट्रेडिंग के लिए या तो एम1 चार्ट या टिक चार्ट चुना जाता है;
 
- अधिकांश जोड़तोड़ ऑर्डर्स के माध्यम से किए जाते हैं;
 
ऊपर वर्णित विचारों की विभिन्न मंचों पर व्यापक रूप से चर्चा की जाती है। इन दृष्टिकोणों के लिए बहुत अधिक जोश और एक अच्छी प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है।

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